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सभा पर्व
अध्याय ३२
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वैशम्पाय़न उवाच
पितामहं गुरुं चैव प्रत्युद्गम्य युधिष्ठिरः |  १   क
अभिवाद्य ततो राजन्निदं वचनमव्रवीत् |  १   ख
भीष्मं द्रोणं कृपं द्रौणिं दुर्योधनविविंशती ||  १   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति