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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
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नारद उवाच
याजकास्तु ततस्तस्य तानग्नीन्निर्जने वने |  ३   क
समुत्सृज्य यथाकामं जग्मुर्भरतसत्तम ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति