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विराट पर्व
अध्याय ३२
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वैशम्पाय़न उवाच
तमसाभिप्लुते लोके रजसा चैव भारत |  १   क
व्यतिष्ठन्वै मुहूर्तं तु व्यूढानीकाः प्रहारिणः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति