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विराट पर्व
अध्याय ३२
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भीमसेन उवाच
सुस्कन्धोऽय़ं महावृक्षो गदारूप इव स्थितः |  १६   क
एनमेव समारुज्य द्रावय़िष्यामि शात्रवान् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति