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विराट पर्व
अध्याय ३२
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वैशम्पाय़न उवाच
चक्ररक्षश्च शूरश्च शोणाश्वो नाम विश्रुतः |  ३०   क
स भय़ाद्द्वैरथं दृष्ट्वा त्रैगर्तं प्राजहत्तदा ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति