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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
विद्याधरानुचरितं किंनरीभिस्तथैव च |  ३५   क
गजसिंहसमाकीर्णमुदीर्णशरभाय़ुतम् ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति