आदि पर्व  अध्याय २

सूत उवाच

प्रय़ाणे परुषश्चात्र संवादः कर्णशल्ययोः |  १७०   क
हंसकाकीय़माख्यानमत्रैवाक्षेपसंहितम् ||  १७०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति