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विराट पर्व
अध्याय ३२
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वैशम्पाय़न उवाच
रत्नानि गाः सुवर्णं च मणिमुक्तमथापि वा |  ४४   क
वैय़ाघ्रपद्य विप्रेन्द्र सर्वथैव नमोऽस्तु ते ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति