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विराट पर्व
अध्याय ३२
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वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्कृते ह्यद्य पश्यामि राज्यमात्मानमेव च |  ४५   क
यतश्च जातः संरम्भः स च शत्रुर्वशं गतः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति