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विराट पर्व
अध्याय ३२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तद्वचनान्मत्स्यो दूतान्राजा समादिशत् |  ४८   क
आचक्षध्वं पुरं गत्वा सङ्ग्रामे विजय़ं मम ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति