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विराट पर्व
अध्याय ३२
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वैशम्पाय़न उवाच
तौ निहत्य पृथग्धुर्यावुभौ च पार्ष्णिसारथी |  ८   क
विरथं मत्स्यराजानं जीवग्राहमगृह्णताम् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति