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उद्योग पर्व
अध्याय ३२
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सञ्जय़ उवाच
अङ्गात्मनः कर्म निवोध राज; न्धर्मार्थय़ुक्तादार्यवृत्तादपेतम् |  १५   क
उपक्रोशं चेह गतोऽसि राज; न्नोहेश्च पापं प्रसजेदमुत्र ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति