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उद्योग पर्व
अध्याय ३२
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सञ्जय़ उवाच
कुले जातो धर्मवान्यो यशस्वी; वहुश्रुतः सुखजीवी यतात्मा |  १८   क
धर्मार्थय़ोर्ग्रथितय़ोर्विभर्ति; नान्यत्र दिष्टस्य वशादुपैति ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति