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उद्योग पर्व
अध्याय ३२
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सञ्जय़ उवाच
अकालिकं कुरवो नाभविष्य; न्पापेन चेत्पापमजातशत्रुः |  २१   क
इच्छेज्जातु त्वय़ि पापं विसृज्य; निन्दा चेय़ं तव लोकेऽभविष्यत् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति