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उद्योग पर्व
अध्याय ३२
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सञ्जय़ उवाच
प्रिय़ाप्रिय़े सुखदुःखे च राज; न्निन्दाप्रशंसे च भजेत एनम् |  २६   क
परस्त्वेनं गर्हय़तेऽपराधे; प्रशंसते साधुवृत्तं तमेव ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति