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उद्योग पर्व
अध्याय ३२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रविश्यानुमते नृपस्य; महद्वेश्म प्राज्ञशूरार्यगुप्तम् |  ६   क
सिंहासनस्थं पार्थिवमाससाद; वैचित्रवीर्यं प्राञ्जलिः सूतपुत्रः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति