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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
क्षिप्रमेष्यति ते भर्ता सर्वशाखामृगैः सह |  ६३   क
प्रत्ययं कुरु मे देवि वानरोऽस्मि न राक्षसः ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति