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द्रोण पर्व
अध्याय ३२
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सञ्जय़ उवाच
द्रोणेन व्याहृते त्वेवं संशप्तकगणाः पुनः |  १५   क
आह्वय़न्नर्जुनं सङ्ख्ये दक्षिणामभितो दिशम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति