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द्रोण पर्व
अध्याय ३२
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सञ्जय़ उवाच
तत्रार्जुनस्याथ परैः सार्धं समभवद्रणः |  १६   क
तादृशो यादृशो नान्यः श्रुतो दृष्टोऽपि वा क्वचित् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति