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द्रोण पर्व
अध्याय ३२
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सञ्जय़ उवाच
ततो द्रोणेन विहितो राजन्व्यूहो व्यरोचत |  १७   क
चरन्मध्यन्दिने सूर्यः प्रतपन्निव दुर्दृशः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति