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कर्ण पर्व
अध्याय ३२
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सञ्जय़ उवाच
सात्यकिर्वृषसेनस्य हत्वा सूतं त्रिभिः शरैः |  ६३   क
धनुश्चिच्छेद भल्लेन जघानाश्वांश्च सप्तभिः |  ६३   ख
ध्वजमेकेषुणोन्मथ्य त्रिभिस्तं हृद्यताडय़त् ||  ६३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति