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कर्ण पर्व
अध्याय ३२
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सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्तु तं दृष्ट्वा विरथं व्याय़ुधं कृतम् |  ६६   क
आरोप्य स्वरथे तूर्णमपोवाह रथान्तरम् ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति