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वन पर्व
अध्याय २१७
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मार्कण्डेय़ उवाच
स भूत्वा भगवान्सङ्ख्ये रक्षंश्छागमुखस्तदा |  ३   क
वृतः कन्यागणैः सर्वैरात्मनीनैश्च पुत्रकैः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति