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वन पर्व
अध्याय १८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
तत्रास्य स्वकृतं कर्म छाय़ेवानुगतं सदा |  २५   क
फलत्यथ सुखार्हो वा दुःखार्हो वापि जाय़ते ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति