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शल्य पर्व
अध्याय ३२
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सञ्जय़ उवाच
किमिदं साहसं राजंस्त्वय़ा व्याहृतमीदृशम् |  ३   क
एकमेव निहत्याजौ भव राजा कुरुष्विति ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति