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शल्य पर्व
अध्याय ३२
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सञ्जय़ उवाच
राजा च धृतराष्ट्रोऽद्य श्रुत्वा पुत्रं मय़ा हतम् |  ३३   क
स्मरिष्यत्यशुभं कर्म यत्तच्छकुनिवुद्धिजम् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति