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शल्य पर्व
अध्याय ३२
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सञ्जय़ उवाच
राज्ञापि धृतराष्ट्रेण त्वय़ा चास्मासु यत्कृतम् |  ३७   क
स्मर तद्दुष्कृतं कर्म यद्वृत्तं वारणावते ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति