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शल्य पर्व
अध्याय ३२
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सञ्जय़ उवाच
त्वत्कृते निहतः शेते शरतल्पे महाय़शाः |  ४०   क
गाङ्गेय़ो भरतश्रेष्ठः सर्वेषां नः पितामहः ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति