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उद्योग पर्व
अध्याय ८२
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वैशम्पाय़न उवाच
पश्यन्वहुपशून्ग्रामान्रम्यान्हृदय़तोषणान् |  १६   क
पुराणि च व्यतिक्रामन्राष्ट्राणि विविधानि च ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति