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शल्य पर्व
अध्याय ३२
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सञ्जय़ उवाच
एते चान्ये च निहता वहवः क्षत्रिय़र्षभाः |  ४३   क
प्रातिकामी तथा पापो द्रौपद्याः क्लेशकृद्धतः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति