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शल्य पर्व
अध्याय ३२
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दुर्योधन उवाच
किं न पश्यसि मां पाप गदाय़ुद्धे व्यवस्थितम् |  ४७   क
हिमवच्छिखराकारां प्रगृह्य महतीं गदाम् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति