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शल्य पर्व
अध्याय ३२
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सञ्जय़ उवाच
सोऽय़ं राजंस्त्वय़ा शत्रुः समे पथि निवेशितः |  ९   क
न्यस्तश्चात्मा सुविषमे कृच्छ्रमापादिता वय़म् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति