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शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
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भीष्म उवाच
ततः पर्वतशृङ्गाभ्यां सहसैव विनिःसृतः |  ११   क
न च प्रतिजघानास्य स गतिं पर्वतोत्तमः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति