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शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
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भीष्म उवाच
स ददर्श द्विधा कृत्वा पर्वताग्रं शुकं गतम् |  २१   क
शशंसुरृषय़स्तस्मै कर्म पुत्रस्य तत्तदा ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति