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शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
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युधिष्ठिर उवाच
गृहस्थो व्रह्मचारी वा वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः |  १   क
य इच्छेत्सिद्धिमास्थातुं देवतां कां यजेत सः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति