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शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
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श्रीभगवानु उवाच
अव्यक्ता व्यक्तभावस्था या सा प्रकृतिरव्यया |  ३०   क
तां योनिमावय़ोर्विद्धि योऽसौ सदसदात्मकः |  ३०   ख
आवाभ्यां पूज्यतेऽसौ हि दैवे पित्र्ये च कल्पिते ||  ३०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति