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अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
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भीष्म उवाच
दृष्टस्तेऽहं प्रतिगच्छस्व तात; शोचत्यसौ तव देहस्य कर्ता |  १८   क
ददामि किं चापि मनःप्रणीतं; प्रिय़ातिथे तव कामान्वृणीष्व ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति