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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
तथा ह्येवं पुनश्च त्वं दृष्टिं स्वां प्रतिमुञ्चसि |  ६७   क
मत्पक्षप्रतिघाताय़ स्वपक्षोद्भावनाय़ च ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति