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शान्ति पर्व
अध्याय २१४
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भीष्म उवाच
मासपक्षोपवासेन मन्यन्ते यत्तपो जनाः |  ४   क
आत्मतन्त्रोपघातः स न तपस्तत्सतां मतम् |  ४   ख
त्यागश्च सन्नतिश्चैव शिष्यते तप उत्तमम् ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति