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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
तव प्रसादाद्भगवन्विशोकोऽय़ं महीपतिः |  १४   क
कुर्यात्कालमहं चैव कुन्ती चेय़ं वधूस्तव ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति