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शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
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भीष्म उवाच
अरोषणो ह्यसौ देवो यस्य भागोऽय़मुद्यतः |  १८   क
न स शक्यस्त्वय़ा द्रष्टुमस्माभिर्वा वृहस्पते |  १८   ख
यस्य प्रसादं कुरुते स वै तं द्रष्टुमर्हति ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति