शान्ति पर्व  अध्याय ३२३

एकतद्वितत्रिता ऊचुः

ततोऽस्मान्सुपरिश्रान्तांस्तपसा चापि कर्शितान् |  ४६   क
उवाच खस्थं किमपि भूतं तत्राशरीरकम् ||  ४६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति