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शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
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एकतद्वितत्रिता ऊचुः
दृष्टा वः पुरुषाः श्वेताः सर्वेन्द्रिय़विवर्जिताः |  ४७   क
दृष्टो भवति देवेश एभिर्दृष्टैर्द्विजोत्तमाः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति