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आदि पर्व
अध्याय १४४
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वैशम्पाय़न उवाच
अनुगृह्य सुहृद्वर्गं धनेन च सुखेन च |  १७   क
पितृपैतामहं राज्यमिह भोक्ष्यन्ति ते सुताः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति