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शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
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एकतद्वितत्रिता ऊचुः
ततस्तदद्भुतं वाक्यं निशम्यैवं स्म सोमप |  ५२   क
तस्य प्रसादात्प्राप्ताः स्मो देशमीप्सितमञ्जसा ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति