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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नोऽप्यसम्भ्रान्तो मुमोचाशीविषोपमान् |  १०८   क
सुवर्णपुङ्खान्विशिखान्द्रोणपुत्रस्य वक्षसि ||  १०८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति