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शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
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भीष्म उवाच
तत एनं समुत्क्षिप्य सहसा विनतासुतः |  ३५   क
उत्पपात नभस्तूर्णं तत्र चैनममुञ्चत ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति