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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
यस्याग्निरास्यं द्यौर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ क्षितिः |  ४४   क
सूर्यश्चक्षुर्दिशः श्रोत्रे तस्मै लोकात्मने नमः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति