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अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
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वासुदेव उवाच
ते न शर्म कुतः शान्तिं विषादं लेभिरे सुराः |  १२   क
विद्रुते सहसा यज्ञे कुपिते च महेश्वरे ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति