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आदि पर्व
अध्याय १८७
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वैशम्पाय़न उवाच
पप्रच्छ चैनं धर्मात्मा यथा ते प्रद्रुताः पुरा |  १४   क
स तस्मै सर्वमाचख्यावानुपूर्व्येण पाण्डवः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति