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शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
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वैशम्पाय़न उवाच
यो ह्यस्माकं गुरुः श्रेष्ठः कृष्णद्वैपाय़नो मुनिः |  १२३   क
स जगौ परमं जप्यं नाराय़णमुदीरय़न् ||  १२३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति